Helpless Everest climber, pathetic government. एवरेस्ट फ़तह मगर सरकार से हारा ।

बुलंदियों पर पहुंचकर दुनिया को मुट्ठी में करने की ख्वाहिश तो सभी की होती है लेकिन कुछ बिरले ही होते है जो ऐसा करिश्मा कर दिखाते है…मध्य प्रदेश के छोटे से शहर राऊ के रहने वाले ऐसे ही साहसी और धुन के पक्के युवा है मधुसूदन पाटीदार जिन्होने एवरेस्ट फतह कर एक बार फिर भारत के तिरंगे का मान बढ़ाया है…लेकिन अफसोस इस बात का है कि ये युवा आज मदद की दरकार लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है…ये है मधुसूदन पाटीदार जो इंदौर के नजदीक बसे छोटे से शहर राऊ के रहने वाले है…इन्होने वो काम करके दिखाया है जो बिरले ही कर पाते है जी हां अपने जज्बे और जुनून के दम पर इन्होने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर फतह हासिल की है वो भी चाइना के उस रास्ते से जहां से एवरेस्ट पर चढ़ाई करना मौत को दावत देने से कम नहीं है…अपने लक्ष्य को हासिल करने इस युवा ने हर उस चौखट पर दस्तक दी जहां उसे मदद मिलने की आस थी और जब कहीं बात नहीं तो अपना घर और मां के जेवर गिरवी रखकर इन्होने एवरेस्ट पर जीत हासिल की…मधुसूदन को भरोसा दिलाया गया था कि एवरेस्ट पर फतह हासिल करके आ जाओ तो सारा खर्चा सरकार देगी लेकिन 6 महीने से ज्यादा का वक्त हो गया किसी ने भी मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाया और हद तो देखिए कि ना तो सरकार और ना ही सरकार के किसी अधिकारी को खबर है कि मध्य प्रदेश के इ होनहार युवा ने एवरेस्ट पर विजय भी हासिल की है…जितनी कठिनाई मधुसूदन को एवरेस्ट की चढ़ाई में नही हुई उतना कठिन रास्ता सरकारी गलियारों का चक्कर काटने तय करना पड़ रहा है…मधु सूदन यहीं नहीं  रुके वो जल्द ही साउथ अफ्रीका के एक और दुनिया के सबसे दुर्गम पहाड़ पर तिरंगा फहराने जा रहे है….अपने एक हाथ की उंगली गंवा चुके मधुसूदन को बस एक ही आस है कि सरकार ने उनसे जो वादा किया था वो निभाए ताकि वो गिरवी रखा अपना घर और मां के जेवर छुड़ा सके…मधुसूदन की आस पूरी होती है या नहीं देखना बाकि है…ब्यूरो रिपोर्ट इंडिया फर्स्ट न्यूज भोपाल

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